पैंतीस वर्षीय शारदा (बदला हुआ नाम) अपने पहले बच्चे को जन्म देने के बाद से ही कई तरह की शारीरिक समस्याओं से जूझने लगीं। असहनीय दर्द जैसी कई समस्याओं को लेकर वह हर रोज़ कभी सरकारी तो कभी प्राइवेट अस्पताल के चक्कर काटतीं। एक दिन महिलाओं के साथ बैठक के दौरान उन्होंने बताया कि वह पिछले कई सालों से अपने स्वास्थ्य को लेकर काफ़ी परेशान हैं। इसके लिए वह काफ़ी पैसे भी खर्च कर चुकी हैं। काफ़ी चर्चा के बाद फिर उन्होंने इस समस्या की मूल वजह बताई या यह कहूं कि उनको खुद इसकी वजह समझ आई। उन्होंने बताया कि वह जिस भी अस्पताल गईं वहां सभी जगह पुरुष डॉक्टर ही थे। इसलिए उन्होंने सिर्फ उनसे अपनी ऊपरी समस्या ही बताई कि उनकी कमर में दर्द रहता है। संकोच के कारण बस वह अपनी समस्या बता ही नहीं पाती। तब उन्हें मैंने सलाह दी कि आप पहले किसी महिला डॉक्टर को दिखाइए और अपनी अपनी समस्याएं बताइए क्योंकि बिना मर्ज़ का पता लगे इलाज नहीं हो सकता।
इस चर्चा के बाद कई और महिलाओं ने शारदा जैसे ही अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे पुरुष डॉक्टर होने की वजह से वे अपनी समयाएं खुलकर उनसे कह नहीं पाती हैं। इसलिए कई बार उनको सही समय पर सही इलाज मिलने में देर भी हो जाती है। ज़ाहिर सी बात है कि गांव में सिर्फ़ अस्पताल होना और उसमें डॉक्टर होना ही काफ़ी नहीं है। अस्पताल में महिला डॉक्टर की मौजूदगी स्वास्थ्य सुविधाओं के इस्तेमाल पर असर डाल सकती है। स्वास्थ्य केंद्रों में महिला डॉक्टरों के न होने से महिलाएं यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं की लिए स्वास्थ्य केंद्र जाने से कतराती हैं।
इतना ही नहीं महिलाओं के लिए लाज और इज़्ज़त के बनाए गए दायरे भी उन्हें लगातार स्वास्थ्य संबंधित सेवा तक पहुंचने में बाधा उत्पन्न करते हैं। पितृसत्ता के कारण जेंडर के आधार पर महिलाओं की परवरिश का असर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा या ये कहा जाए कि ज़िंदगी के हर पहलुओं पर बुरी तरह पड़ता है, जिसकी क़ीमत कई बार महिलाओं को अपनी जान देकर भी चुकानी पड़ती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस लाज के पर्दे की परत और मोटी अशिक्षा और जागरूकता की कमी वजह से हो जाया करती है।
इंडियास्पेंड में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, अस्पतालों के बाहर महिला मरीज़ों को बल्कि महिला डॉक्टरों की उपलब्धता को कोई ख़ास महत्व नहीं दिया जाता है। लोकसभा में दिसंबर 2017 में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने ये बात मानी थी कि देश में महिला डॉक्टरों की कमी से जुड़े आंकड़े इकट्ठे नहीं किए जाते हैं यानि डॉक्टरों की कमी के आंकड़े उपलब्ध हैं पर प्राथमिक स्वास्थ केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और ज़िला अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कितनी कमी है इसका कोई लेखा-जोखा सरकार के पास नहीं है। आंकड़े इकट्ठे् करना इसलिए बेहद ज़रूरी हो जाता है क्योंकि इन्हीं आंकड़ों के आधार पर ही सरकार नीतियां बनाती है, आपूर्तियों और ख़ामियों का आंकलन करती है। ग़रीब, ग्रामीण और सूदूर इलाक़ों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी, ना सिर्फ़ भारत में, बल्कि दुनियाभर में एक चुनौती है।
अगर मैं अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की बात करूं तो विकास की दौड़ में गाँव तक स्वास्थ्य केंद्रों की पहुंच तो बन गई है, लेकिन महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को सुचारू और सही तरीक़े से चलाने के लिए काम तो क्या विचार भी अभी दूर की कौड़ी समझ आती है। लगातार गांव में महिलाओं के बीच प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं महिलाओं के विकास को बाधित करने में अहम भूमिका अदा कर रही हैं जिसे दूर करना बेहद ज़रूरी है। हमें यह समझना होगा कि सदियों के शर्म और लाज के नियम के अनुसार हम महिलाओं की परवरिश की गई ऐसे में स्वास्थ्य केंद्र पर प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को वे पुरुष डॉक्टर के साथ शेयर करने में सहज नहीं हैं। इसलिए ज़रूरी है कि उनकी इस सहजता को गंभीरता से लेते हुए महिला डॉक्टर की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ाने की दिशा में काम किया जाए।